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PAHALE AAP

Posted On: 10 Dec, 2013 Others में

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विधान सभा चुनाव नतीजों ने क्या हमारे राजनीतिक दलों का मिजाज बदल दिया है! दिल्ली में बीजेपी और आम आदमी पार्टी ‘पहले आप’ का नारा लगाते हुए जिस प्रकार राज्य की सत्ता एक-दूसरे की ओर उछाल रही हैं उसे देख कर दुनिया हैरान हो रही होगी। सबसे अधिक सीटें जीतने के बावजूद बीजेपी बहुमत की जादुई सीमा से पीछे रह गई है। यही हाल राजनीति में धमाकेदार शुरुआत करने वाली ‘आप’ का भी है। कांग्रेस की पंद्रह वर्षो की सत्ता से बेदखली में निर्णायक भूमिका निभाने और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद सत्ता की सीढ़ी उसकी पहुंच से दूर है। पहले वाले दिन होते तो दूसरी पार्टियों में तोड़ फोड़ या सौदेबाजी का आजमाया नुस्खा काम आ जाता। लेकिन इस बार के हालात थोड़े अलग चल रहे हैं। सामाजिक आंदोलन की कोख से निकले ‘आप’ ने राजनीति के फामरूले में हेरफेर कर दिया है। ‘आप’ की सफलता ने इस फामरूले का दम भी साबित कर दिया है। ऐसे में बीजेपी चाह कर भी दूसरी पार्टियों में सेंध लगाने जैसी हरकतों की हिम्मत नहीं जुटा पा रही होगी। कांग्रेस की पटखनी और सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद बीजेपी को मिले वोटों का अनुपात ऐसा नहीं है जो उसके आत्मविश्वास को जगमगा सके। ‘आप’ के हमले में कांग्रेस अगर धराशायी दिख रही है तो बीजेपी भी कम लहूलुहान नहीं हुई है। ‘आप’ ने कांग्रेस और बीजेपी दोनो की सीटें छीनी हैं और उनके वोटरों का मोहभंग किया है। देश की सत्ता का सपना पाल रही बीजेपी ऐसे हालात में अगर ‘लखनवी तहजीब’ पर उतर आयी है तो आश्र्चय कैसा! लेकिन ‘पहले आप’ के इस खेल का खामियाजा दिल्ली के वोटरों को भुगतना पड़ेगा जिन्होंने बदलाव के लिए बढ़ चढ़ कर वोट डाले थे और अब लोकप्रिय सरकार के लिए उन्हें शायद लंबा इंतजार करना पड़ जाए। ‘आप’ के फामरूले ने यकीनन देश की तमाम पार्टियों पर अपने ढंग से असर डाला है। कल तक प्रधानमंत्री के नाम पर जो कांग्रेस मनमोहन सिंह की कसमें खाते नहीं थकती थी, अब अचानक उसका रुख बदल गया है। नतीजों का रुझान स्पष्ट होते ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी संकेत देती दिखीं कि मनमोहन सिंह की कुर्सी की मियाद अब आम चुनाव से आगे नहीं जाने वाली। राहुल गांधी तो ऐसे आक्रामक अंदाज में दिखे मानो वह पूरे कांग्रेस को ही सुपर ‘आप’ में बदल कर रख देंगे। दिल्ली में ‘आप’ ने जिस प्रकार कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगायी है, उसे देखते हुए सोनिया और राहुल की चिंता समझी जा सकती है। ‘आप’ की अंगड़ाई के पीछे दलित और मुस्लिम वोटरों के असरदार तबके की ताकत दिखी है। आश्र्चय नहीं कि राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में निर्णायक जीत के बावजूद बीजेपी खुद ‘आप’ के बुखार से तप रही है। ‘आप’ की हैरतअंदाज जीत ने राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का हौसला भी बढ़ा दिया है। ‘आप’ जैसी राजनीतिक पार्टी, अभी जिसके दूध के दांत भी नहीं टूटे हैं अगर ‘मोदी के रथ’ का चक्का जाम कर सकती है तो वे कहां किसी से कम हैं। क्षेत्रीय पार्टियों की यह सोच बीजेपी के लिए नए गठबंधन साथियों की तलाश में अवरोध साबित हो सकती है। लेकिन इन नतीजों का सबसे बड़ा आघात तो सरकार के कामकाज पर पड़ने जा रहा है। संसद में महत्वपूर्ण बिल लटक सकते हैं और आर्थिक सुधारों की राह भी अवरुद्ध हो सकती है।

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