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यह कैसी देशभक्ति प्रशांत भूषण जी!

Posted On: 15 Jan, 2014 Others में

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आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्य और देश के जाने-माने
अधिवक्ता प्रशांत भूषण कश्मीर से सेना हटाने पर जनमत
संग्रह की मांग कर सवालों के घेरे में आ गए हैं। इससे
उनकी मुश्किलें तो बढ़ी ही आम
आदमी पार्टी को भी जवाब देना मुश्किल हो गया है। यह
विचित्र है कि एक ओर देश आम आदमी पार्टी से सकारात्मक राजनीति और राष्ट्रीय मसलों पर उसके स्पष्ट
दृष्टिकोण की आस लगाए हुए है, वहीं उसके प्रखर
प्रवक्ता प्रशांत भूषण अपने खतरनाक विचारों से
अलगावादियों और
राष्ट्रविरोधी ताकतों की हौसला आफजाई कर रहे हैं। यह
विश्वास नहीं किया जा सकता कि प्रशांत भूषण कश्मीर के मौजूदा हालात से सुपरिचित नहीं होंगे या सेना हटाए
जाने पर कश्मीर की क्या दशा होगी इसका उन्हें भान
नहीं होगा। तो फिर उन्होंने यह बयान क्यों दिया?
क्या उनका मकसद वितंडा खड़ा करना था ? या यह
समझा जाए कि उन्होंने आम चुनाव को देखते हुए तुष्टीकरण
का दांव चला है ? सच जो भी हो पर उनके बयान से देश मर्माहत हुआ है। हालांकि अरविंद केजरीवाल ने उनके
जनमत संग्रह की मांग को खारिज कर पार्टी का बचाव
किया है, लेकिन उनका यह
कहना भी कि लोगों की भावना के अनुरूप काम
किया जाना चाहिए, अन्यथा लोकतंत्र खतरे में होगा, एक
तरह से प्रशांत भूषण के बयान का समर्थन ही है। देश जानना चाहता है कि आखिर आम आदमी पार्टी कश्मीर
मसले पर स्पष्ट दृष्टिकोण निर्मित क्यों नहीं कर
सकी है जिसकी वजह से उसके सदस्यों को अनाप-शनाप
बकन पड़ रहा है। आखिर लोग कैसे विश्वास करें
कि प्रशांत भूषण की राय आम आदमी पार्टी की राय
नहीं है? गौरतलब है कि 25 सितंबर 2011 को भी प्रशांत भूषण ने वाराणसी में ऐसा ही बयान दिया था और
हंगामा मचा था। उस समय भी केजरीवाल को आगे आकर
सफाई देनी पड़ी कि यह उनके निजी विचार हैं। लेकिन
सवाल यह कि निजी विचारों का यह तमाशा कब तक
चलता रहेगा? प्रशांत भूषण आम आदमी पार्टी के एक
जिम्मेदार सदस्य हैं। अगर वह किसी मसले पर अपनी राय रखते हैं तो देश में यही संदेश जाएगा कि यह
उनकी पार्टी की राय है। उचित होगा कि आम
आदमी पार्टी प्रशांत भूषण
को अपनी पार्टी का दिग्विजय सिंह न बनाएं जो पहले
तो उनके विचारों को खारिज करती है और फिर उसी पर
सवार हो जाती है। अब जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बन गयी है और 20 राज्यों में
चुनाव लड़ने की घोषणा भी कर दी है तो उसके महत्वपूर्ण
सदस्यों को तोलमोल कर बोलना ही उचित होगा। आम
आदमी पार्टी को कश्मीर मसले पर अतिशीघ्र अपनी राय
स्पष्ट करनी चाहिए। लेकिन विचित्र है कि वह
उहापोह के खोल में दुबकी पड़ी है। इसका तात्पर्य यह निकलता है कि उसका राष्ट्रीय मसलों पर गंभीर चिंतन
नहीं है। पार्टी चाहे जितनी सफाई दे, प्रशांत भूषण के बयान
से ऐसा ही प्रतीत होता है। उचित होगा कि आम
आदमी पार्टी समान नागरिक संहिता, धारा 370,
कश्मीरी पंडितों का विस्थापन, बांग्लादेशी घुसपैठी,
पड़ोसी देशों से संबंध, रामजन्मभूमि विवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, आरक्षण, एफडीआइ और एनसीटीसी जैसे
गंभीर मसलों पर अपना रुख स्पष्ट करें ताकि उसके
सदस्यों के नकारात्मक विचारों से बार-बार देश को लहूलुहान
न होना पड़े। अभी चंद रोज पहले ही प्रशांत भूषण ने
तमिलनाडु में कुडानकुलम परमाणु संयंत्र का विरोध करते हुए
कहा कि वह दिन दूर नहीं जब जनता निर्णय लेगी कि कुडानकुलम जैसे परमाणु संयंत्र चलाए जाएं
अथवा नहीं। बेशक जनता के विचारों का स्वागत और आदर
होना चाहिए। लेकिन क्या यह उचित होगा कि सुरक्षा,
आर्थिक नीतियां, विदेशी संबंध और परमाणु उर्जा जैसे
संवेदनशील मसलों पर जनमत संग्रह हो? क्या इसके नतीजे
घातक नहीं होंगे?। बहरहाल, प्रशांत भूषण के विचारों से यही प्रतीत होता है कि केंद्रीय सत्ता हाथ लगने पर
उनकी पार्टी इन संवेदनशील मसलों पर भी जनमत संग्रह
कराएगी। अगर ऐसा नहीं तो फिर
पार्टी को अपना एजेंडा साफ करना चाहिए। ठीक है
कि दिल्ली में जनमत संग्रह करा वह कांग्रेस के समर्थन से
सरकार बनाने में कामयाब रही। लेकिन यह दवा सभी मर्जों का इलाज नहीं है। संवेदनशील मसलों पर
सरकारों को ही सूझबूझ से निर्णय लेना होगा। यह देश के
हित में भी है। अच्छी बात यह है कि अधिकांश
राजनीतिक दलों ने प्रशांत भूषण के बयान
की कड़ी निंदा की। राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता अरुण
जेटली ने तो उन्हें अलगाववादियों की तरह बातें नहीं करने की हिदायत भी दी। खुद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर
अब्दुला ने सीधे तौर पर जनमत संग्रह का विरोध किया।
वहीं कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद ने यह कहकर
आलोचना की कि जिन्हें एकबारगी सफलता मिल
जाती है, वह खुद को सिकंदर मानने लगते हैं। लेकिन
सच्चाई यह भी है कि कश्मीर से सेना हटाने की मांग सिर्फ प्रशांत भूषण ही नहीं किए हैं। उमर अब्दुला भी इसके
पक्षधर हैं। समय-समय पर कांग्रेस भी इसमें सुर
मिलाती रही है। याद रखना होगा कि गृहमंत्री रहते हुए
पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर से सशस्त्र
सेना विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा के कड़े
प्रावधानों को हटाने की चेष्टा की लेकिन सुरक्षा संबंधी कैबिनेट कमेटी ने
उनकी कोशिशों को परवान नहीं चढ़ने दिया। जम्मू-
कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला और विपक्षी दल
पीडीपी एक अरसे से इस कानून को हटाने की मांग कर रहे हैं।
लेकिन प्रशांत भूषण की तरह किसी ने इस मसले पर जनमत
संग्रह कराने की जुगाली नहीं की। उचित होता कि प्रशांत भूषण जम्मू-कश्मीर में सेना हटाने के लिए जनमत संग्रह
की मांग के बजाए कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के सवाल
पर जनमत संग्रह की आवाज लगाते या धारा 370 पर
देशव्यापी बहस चला इस पर जनमत संग्रह की मांग करते।
इससे देश की एकता और अखंडता को मजबूती मिलती।
दुनिया को पता है कि 5 लाख से अधिक कश्मीरी पंडित आज दिल्ली की सड़कों पर खानाबदोशों की तरह जीवन
व्यतीत कर रहे हैं। घाटी में उनके करोड़ों की संपत्तियों पर
चरमपंथियों का कब्जा है। लेकिन आज तक प्रशांत भूषण
या उनकी आम आदमी पार्टी किसी ने एक शब्द
भी कश्मीरी पंडितों के पक्ष में नहीं बोला। आखिर
क्यों? शायद इससे वोट हासिल नहीं होगा या यों कहें कि मुसलमान नाराज हो जाएंगे। अभी चंद रोज पहले जम्मू-
कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुला ने अफसोस
जताया कि कश्मीरी पंडितों के बिना कश्मीर अधूरा है।
लेकिन उनसे पूछा जाना चाहिए कि उनकी सरकार
कश्मीरी पंडितों की घर वापसी सुनिश्चित करने के
लिए क्या कदम उठाए हैं? उनके इस आश्वासन से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि उनकी सरकार
कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा देने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस तरह का आश्वासन दशकों से सुना जा रहा है। लेकिन
सच्चाई है कि घाटी में मुठ्ठीभर कश्मीरी पंडित
भी सुरक्षित नहीं रह गए हैं। अभी पिछले दिनों ही ईद
के दिन किश्तवाड़ में कट्टरपंथियों ने सैकड़ों हिंदुओं को निशाना बनाया। देश विरोधी नारा लगाया और आजाद
कश्मीर की मांग की। जब राष्ट्रवादियों ने इसका विरोध
किया तो उन्हें मारा-काटा गया। उनके घरों को लूट
लिया गया। महिलाओं की आबरु से खिलवाड़ किया गया।
किश्तवाड़ की हिंसा के बाद जम्मू, राजौरी, उधमपुर, सांबा,
कठुआ, रिआसी और डोडा धधकता रहा और उमर सरकार हाथ-पर-हाथ धरी बैठी रही। इस हिंसा में जम्मू-कश्मीर के
गृह राज्यमंत्री सज्जाद किचलू का हाथ बताया गया।
लेकिन उमर सरकार उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं की।
फिर कश्मीरी पंडित किस भरोसे घाटी में लौटें ? तीन
दशक के दरम्यान घाटी से दो तिहाई से अधिक
अल्पसंख्यक को पलायित होना पड़ा है। लेकिन इसके लिए सिर्फ आतंकी ही जिम्मेदार नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर
की सरकारें और वे तथाकथित सेक्यूलर राजनीतिक दल
भी बराबर के जिम्मेदार हैं जो वोटयुक्ति के लिए
कभी जम्मू-कश्मीर से सेना हटाने तो कभी जनमत संग्रह
की मांग करते हैं। सच्चाई यह है कि जम्मू-कश्मीर
की सरकार के एजेंडा में अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा प्राथमिकता में रह ही नहीं गया है। 19
जनवरी 1990 के नरसंहार के बाद से ही सभी सरकारों ने उन्हें
घाटी से खदेड़ने का काम किया। आज अगर जम्मू-कश्मीर में
जनमत संग्रह हो तो वह भारत के नक्शे से मिट जाएगा।
घाटी में पाकिस्तानी आतंकियों और
अलगाववादियों की हुकूमत होगी। क्या प्रशांत भूषण की यही मंशा हैं? आम आदमी पार्टी को अपने इस
दिग्विजय सिंह को संभालकर रखना होगा।

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