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इस विरोध का मतलब!

Posted On: 23 Jan, 2014 Others में

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दिल्ली में रेल भवन के सामने धरना की शुरुआत करते हुए ‘आप’ सुप्रीमो और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दावा किया था कि उनकी तैयारी कम से कम दस दिनों की है। शुक्र है कि बत्तीस घंटों में ही उन्हें समझ आ गयी और पार्टी बोरिया बिस्तर बांध कर धरनास्थल से निकल आयी। जिस झटके से विरोध का यह नाटक शुरू हुआ था, उसका अंत भी वैसे ही नाटकीय अंदाज में हुआ। केजरीवाल को हालांकि अचानक के इस अंत में भी ‘आंशिक’ सफलता के दर्शन हो रहे हैं लेकिन पुलिस के दो अपेक्षाकृत जूनियर अफसरों को तनख्वाह के साथ छुट्टी पर भेजे जाने से पुलिस सुधार का व्यापक लक्ष्य कैसे पा लिया गया, यह रहस्य केजरीवाल के अलावा और कौन समझा सकता है। तनाव, संघर्ष और अपशब्दों की बौछार से भीगे इन बत्तीस घंटों ने लेकिन देश, दिल्ली और खुद ‘आप’
को बेशकीमती सबक दिए हैं। एक निर्वाचित सरकार के मुखिया होने के नाते केजरीवाल अगर पुलिस की कमान चाहते हैं तो इसमें गलत नहीं है क्योंकि कानून व्यवस्था के सवाल पर जनता सत्ताधारी पार्टी और सरकार से ही जवाब मांगती है। पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग के पीछे इसी विसंगति को रेखांकित करने की कोशिश थी। लेकिन जो तरीका चुना गया, उसमें मतलब राजनीति का छुपा हुआ दिखता है- कांग्रेस को समर्थन वापसी पर मजबूर करना और ऐसे हालात बना देना जिसमें केंद्र के पास ‘आप’ सरकार की बर्खास्तगी के अलावा दूसरा रास्ता न बचे। ऐसा होने पर कांग्रेस का तो वह ‘खेल’ ही फेल हो जाता जिसमें ‘आप’ सरकार को एकतरफा समर्थन देकर बीजेपी की मुश्कें कसने की तैयारी थी। दिल्ली में शर्मनाक पटखनी खाने के बावजूद कांग्रेस को ‘आप’ से खतरा नहीं दिखता क्योंकि जिस पार्टी ने अभी घुटनों के बल चलना भी नहीं सीखा, वह ठोस संगठन और अनुभव के अभाव में भारत जैसे विशाल देश के गांवों और कस्बों में अपनी मौजूदगी इतनी जल्दी कैसे बना पाएगी! कांग्रेस की नजर में केजरीवाल शहरी पार्टी चला रहे हैं जो अंतत: बीजेपी के शहरी और मध्यवर्गीय मतदाता आधार को ही चोट पहुंचाने वाली है। लेकिन पुलिस सुधार जैसे महत्वपूर्ण सवाल उठा कर केजरीवाल इसकी आड़ में अगर लोकसभा चुनाव के मंसूबे बांध रहे हैं तो यह भी उतना ही गलत है। बेशक दिल्ली पुलिस का संचालन केंद्र का गृह मंत्रालय करे, यह व्यावहारिक नहीं दिखता क्योंकि संविधान में इसकी व्यवस्था राज्यों वाली सूची के शेडय़ूल में है। महज तीन साल पहले तक लेफ्टिनेंट गवर्नर और दिल्ली के वित्त सचिव पुलिस के बजट निर्धारण में भागीदार हुआ करते थे। अब किन कारणों से केंद्र के गृह मंत्रालय ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए तमाम अधिकार हथिया लिए, यह कौन बताएगा! शीला दीक्षित सरकार ने खामोशी से अधिकार हाथ से निकलने दिए हालांकि कांग्रेस और बीजेपी के हर चुनाव घोषणापत्र में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा और पुलिस अधिकारों की मांग रहती है। दिल्ली पुलिस के जंग खाए कानूनों को बदलने के लिए तैयार पुलिस बिल वर्षो से गृह मंत्रालय की फाइलों में दबा पड़ा है। 2006 में सुप्रीमकोर्ट ने पुलिस सुधार की व्यापक वकालत करते हुए दिल्ली में भी राज्य सुरक्षा कमीशन के गठन का निर्देश दिया था। 2012 में यह बन तो गया लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। अगर यह असरदार होता तो केजरीवाल को शायद धरना पर नहीं बैठना पड़ता क्योंकि मुख्यमंत्री भी इसका सदस्य होता है।

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