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टोपी पर सियासत सोची-समझी रणनीति

Posted On: 21 Apr, 2014 Others में

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मुस्लिम समुदाय के अहम
पहनावे में शुमार टोपी एक
बार पुनः चर्चाओं के केंद्र में
है| अत्यधिक चर्चा के
केंद्र में होने से ‘मुस्लिम
टोपी’ सियासी गलियारों में चर्चा का मुद्दा प्रमुख बन गई है। एक ओर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह
की मुस्लिम टोपी पहने तस्वीर सोशल मीडिया पर
चर्चा के केंद्र में है तो दूसरी ओर उसी पार्टी के
प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने इसे महज
दिखावा करार दिया है| बिना राजनाथ सिंह का संदर्भ
लिए मोदी ने गुरुवार को एक बार फिर दोहराया कि वह केवल दिखावे या किसी को खुश
करने के लिए कोई ‘प्रतीक’ नहीं पहनेंगे। साथ
ही उन्होंने सवाल
उठाया कि क्या सोनिया गांधी मुस्लिम
टोपी पहनेंगी? कुछ समय पहले मुस्लिम टोपी पहनने से
इंकार करने वाले विवाद पर सफाई देते हुए मोदी ने कहा, ‘यदि टोपी पहनना एकता के प्रतीक पर देखा जाता है
तो मैंने महात्मा गांधी, सरदार पटेल और पंडित जवाहर
लाल नेहरू को ऐसी कोई टोपी पहने हुए नहीं देखा।’
मोदी ने यह भी कहा, ‘दरअसल, दिखावे
की राजनीति ने भारतीय राजनीति को घेरा हुआ है।
मेरा काम सभी धर्मों और परंपराओं का सम्मान करना है। मैं अपनी परंपरा के हिसाब से जीता हूं और
दूसरों की परंपराओं का सम्मान करता हूं। यही कारण है
कि मैं टोपी पहन कर फोटो खिंचवाकर
किसी को मूर्ख नहीं बना सकता। अगर कोई मुझे
बदनाम करने की कोशिश करेगा तो मैं इसे याद
रखूंगा और मौका मिलने पर इसकी सजा भी दूंगा।’ गौरतलब है कि गुजरात में एक मुस्लिम सम्मलेन में
मोदी ने मुस्लिम टोपी पहनने से इंकार कर दिया था|
तब मोदी के इंकार को उनका मुस्लिम
विरोधी रवैया करार दिया गया था| उसके कुछ समय बाद
ही जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
ने रजा मुराद के साथ एक धार्मिक आयोजन में मुस्लिम टोपी पहनी तो इसे उनका बड़ा और उदार
रवैया बताया गया| तब मीडिया के एक तबके में
मोदी बनाम शिवराज की मुस्लिम समुदाय के
प्रति उदारता को मुद्दा बनाकर पेश करने की कोशिश
की गई थी| हालांकि तब भाजपा के वरिष्ठ
पदाधिकारियों के हस्तक्षेप ने पार्टी में दो बड़े ध्रुवों के असमय टकराव को बचा लिया था, किन्तु अब
लोकसभा चुनाव के अंतिम चरणों में एक बार फिर
यही मुस्लिम टोपी भाजपा के दो शीर्ष ध्रुवों में टकराव
का कारण बन सकती है| लखनऊ में नामांकन दाखिल
करने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने
बाबा मीर कासिम की मजार सजदा किया| यही नहीं, राजनाथ सिंह ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल
लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष और प्रतिष्ठित
शिया उलेमा मौलाना कल्बे सादिक, मौलाना कल्बे
जवाद, मौलाना हमीदुल हसन, मौलाना यासूब अब्बास के
अलावा ईदगाह के इमाम तथा पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य
मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली से उनके घर जाकर अलग अलग भेंट की थी। इस दौरान उन्होंने जो मुस्लिम
टोपी पहनी, बस वही सोशल मीडिया पर वायरल हो गई
और अब उस तस्वीर पर पूरे विवाद का ताना-
बाना बुना जा रहा है| हालांकि राजनाथ द्वारा मुस्लिम टोपी पहनने के
सियासी मायने हैं| चूंकि राजनाथ इस बार उत्तर प्रदेश
की राजधानी लखनऊ से चुनाव लड़ रहे हैं और यहां करीब
एक चौथाई मुस्लिम मतदाता हैं।
यहां शिया मुसलमानों की तादाद करीब १८ लाख है। जब
तक अटल बिहारी बाजपेयी लखनऊ से चुनाव लड़ते रहे, उनकी सर्वहारा छवि के चलते मुस्लिम वर्ग के वोट
भी उन्हें मिलते रहे| किन्तु राजनाथ जिस तरह
की राजनीति करते हैं उससे उन्हें इन १८ लाख वोटों के
मिलने में संशय था| लिहाजा सारा मामला एक
तयशुदा स्क्रिप्ट की तरह लिखा गया| यहां तक
कि मौलाना कल्बे जवाद की राजनाथ की पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से
तुलना को भी सियासी जानकार प्रधानमंत्री पद हेतु
भाजपा की ओर से बतौर सर्वस्वीकार चेहरे का नाम दे रहे
हैं| यानि यदि किसी कारण
भाजपा को अपनी अपेक्षानुरूप सीटें नहीं मिलीं और
मोदी के नाम पर यदि सेक्युलर दल सहमत नहीं होते हैं तो राजनाथ का नाम आगे बढ़ाया जा सकता है| राजनाथ
की अटल से
तुलना हालांकि अतिशयोक्ति की पराकाष्ठा है
किन्तु यही तुलना उनके लिए ऐसे अवसर के द्वार खोल
सकती है जैसे २००४ में मनमोहन सिंह के लिए खुले थे|
राजनाथ इस मामले में लाख सफाई पेश करें किन्तु राजनीति के घाघ व चतुर खिलाड़ी के रूप में
उनकी पहचान किसी से छिपी नहीं है|
कभी मायावती का साथ देना तो कभी मुलायम के साथ
गलबहियां करना, अध्यक्ष बनने के बाद
मोदी को साधना तो नागपुर में संघ प्रमुख के ऊपर अजय
संचेती को तहरीज देना; राजनाथ की सियासत के ऐसे पहलू हैं जिन्होंने उन्हें मजबूत किया हुआ है| हाल ही में
‘अबकी बार-मोदी सरकार’ की जगह ‘आपकी बार-
भाजपा सरकार’ का पोस्टर, वह भी अपनी तस्वीर के साथ
जारी कर उन्होंने अपनी मंशा को साफ कर दिया था पर
भाजपा और संघ का उनके प्रति अति-आत्मविश्वास
ही उनपर एक न एक दिन अवश्य भारी पड़ेगा| खैर, राजनाथ कितने भी दांव-प्रपंच कर लें, मोदी के ऊपर
तो उनको तवज्जो मिलने से रही| यदि वे
राजनीति में इतने ही प्रासंगिक होते तो न तो उन्हें
गाज़ियाबाद की अपनी सीट छोड़ सुरक्षित सीट
की तलाश में लखनऊ आना पड़ता और न ही मुस्लिम
टोपी पहनकर खुद को सेक्युलर साबित करना पड़ता|
somansh suryaa

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