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पाकिस्तान में निशाने पर पत्रकार

Posted On: 28 Apr, 2014 Others में

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पाकिस्तान के अग्रणी समाचार चैनल जियो टीवी के एंकर हामिद मीर पर जानलेवा हमले से न सिर्फ पाकिस्तान में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ लहूलुहान हुआ है बल्कि नियंतण्र स्तर पर पत्रकारों की सुरक्षा का सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। हामिद मीर की गिनती पाकिस्तान के उन चंद पत्रकारों में होती है जिन्हें आतंकवाद और सुरक्षा मामलों का विशेषज्ञ तो माना ही जाता है, उन्हें जोखिमपूर्ण पत्रकारिता के लिए भी जाना जाता है। गौरतलब है कि वे कभी ओसामा बिन लादेन का साक्षात्कार कर चुके हैं। अरसे से वे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान जैसे अनगिनत आतंकी संगठनों के निशाने पर हैं और उन्हें अनेक बार धमकियां भी मिल चुकी हैं। नवम्बर, 2012 में भी उनकी कार के नीच बम रखकर उन्हें खत्म करने की कोशिश की गई थी लेकिन वे भाग्यशाली रहे। समय रहते बम बरामद कर लिया गया। कहा जाता है कि बम पाकिस्तानी तालिबान ने रखवाया था। कहा तो यह भी जा रहा है कि हामिद मीर पहले ही आईएसआई प्रमुख पर अपनी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा चुके हैं और उन्होंने लिखित रूप में इसकी जानकारी सरकार के जिम्मेदार लोगों को भी दी है। उन्होंने एक संदेश भी रिकॉर्ड कराया है, जिसमें उन्होंने आईएसआई प्रमुख जहीर समेत कुछ कर्नल रैंक के अधिकारियों के नाम लिए हैं। लेकिन आश्र्चय कि इन सबके बावजूद भी सरकार ने उनकी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं किया। शुक्र है कि आधा दर्जन गोलियां लगने के बाद भी वे सलामत हैं और उनका हौसला बुलंद हैं। हामिद मीर के भाई ने आरोप लगाया है कि इस हमले के पीछे आईएसआई का हाथ है। सच क्या है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा। नवाज शरीफ सरकार ने हमले की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन कर दिया है। साथ ही हमलावरों से जुड़ी कोई भी सूचना देने वालों को एक करोड़ रपए इनाम देने की भी घोषणा की गई है। लेकिन अभी इस निष्कर्ष पर पहुंचना कठिन है कि हमलावरों की पहचान हो सकेगी और उन्हें दंडित किया जा सकेगा। इसलिए कि पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में पाकिस्तान का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। अभी पिछले महीने ही वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक रजा रूमी पर लाहौर में गोलियां बरसाई गई। वे बच गए लेकिन उनके ड्राइवर की मौत हो गई। गुनाहगार अब भी पकड़ से बाहर हैं। तब प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने वादा किया था कि वे देश के पत्रकारों को सुरक्षा मुहैया कराएंगे। लेकिन हामिद मीर पर हमले ने उनके दावे की पोल खोल दी है। सच तो यह है कि पाकिस्तान में पत्रकार सुरक्षित ही नहीं हैं। वे खौफ के साए में जी रहे हैं। उन्हें सच्ची पत्रकारिता से रोका जा रहा है। यह तथ्य है कि सुरक्षा के अभाव में खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान और कबायली इलाके पत्रकारों के लिए कत्लगाह बन गए हैं। हर वर्ष आतंकी संगठन दर्जनों पत्रकारों को निशाना बनाते हैं और सरकार हाथ पर हाथ धरी बैठी रहती है। याद होगा कि मई, 2012 में पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार सलीम शहजाद को राजधानी इस्लामाबाद में ही आतंकियों ने अगवा कर मौत के घाट उतार दिया था। उनकी हत्या के दो साल होने को हैं और जांच प्रक्रिया भी पूरी हो गई है लेकिन अभी तक किसी गुनाहगार को न्याय के कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सका है। यह दर्शाता है कि पाकिस्तान की सरकार पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर संजीदा नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि पत्रकारों की हत्या के खेल में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई भी शामिल है। पत्रकार सलीम शहजाद की हत्या का आरोप उसी पर है। सलीम शहजाद के परिजनों का कहना है कि उन्होंने चरमपंथियों और सेना के बीच संबंधों का खुलासा किया था, इसलिए उनकी हत्या कराई गई। बवाल मचने पर पाकिस्तान सरकार ने न्यायिक आयोग का गठन किया और भरोसा दिया कि गुनाहगारों को सजा मिलेगी। लेकिन गुनाहगार पकड़ से बाहर हैं। ऐसे में अगर अराजक तत्वों का हौसला बुलंद होता है और पत्रकारों पर हमले बढ़ते हैं तो यह अस्वाभाविक नहीं है। कई रिपोटरे में में भी कहा जा चुका है कि पत्रकारों के लिए पाकिस्तान विश्व में सर्वाधिक खतरनाक देशों में से एक है। यहां सशस्त्र समूह और खुफिया एजेंसियां खासकर आईएसआई पत्रकारों के लिए खतरा पैदा करती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पुलिस और सुरक्षाबलों, आपराधिक समूहों, प्रदर्शनकारियों और राजनीतिक दलों के समर्थकों जैसे लोगों की धमकियों और शारीरिक हिंसा के शिकार होने वाले पत्रकारों को अक्सर न्याय पण्राली से न्याय नहीं मिल पाता है। लेकिन गौर करें तो पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया के हर कोने में पत्रकार असुरक्षित हैं। लोकतंत्र का दम भरने वाले देशों में भी उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। गत दिनों लंदन की इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट (आईएनएसआई) की रिपोर्ट में कहा गया कि 2013 में रिपोर्टिग के दौरान दुनिया भर में 134 पत्रकार और मीडिया को सहायता देने वाले कर्मी मारे गए। इनमें 65 पत्रकारों की मौत सशस्त्र संघर्ष की कवरेज के दौरान हुई, जिन्हें सोच-विचार कर निशाना बनाया गया। आईएनएसआई की ‘किलिंग द मैसेंजर’ रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि साल, 2012 में 152 पत्रकार मारे गए। इराक, सोमालिया, फिलीपीन, श्रीलंका, सीरिया, अफगानिस्तान, मैक्सिको, कोलंबिया, पाकिस्तान और रूस जैसे देशों को पत्रकारों के लिए खतरनाक बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इराक पत्रकारों की हत्या के मामले में शीर्ष पर है। 2008 में इस सव्रे की शुरुआत से ही इराक पत्रकारों की हत्या के एक सैकड़ा मामलों में से एक में भी सजा न दिलाने के कारण सूची में शीर्ष पर है। हाल ही में अमेरिकी वॉच डॉग संस्था ‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (सीपीजे) की रिपोर्ट में कहा गया है कि सीरिया पत्रकारिता के लिए सबसे खतरनाक देश है। गौरतलब है कि यहां के हालात बिगड़े हुए हैं। राष्ट्रपति बशर-अल-असद और विद्रोहियों के बीच जंग छिड़ी हुई है। यहां पत्रकार न सिर्फ संघर्ष में कवरेज के दौरान अपनी जान गंवा रहे हैं बल्कि उन्हें किडनैप कर मौत के घाट भी उतारा जा रहा है। एक आंकड़े के मुताबिक सीरिया में अभी तक 60 से अधिक पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। अभी पिछले दिनों ही सीरिया में दस माह से कैद फ्रांस के चार पत्रकारों को रिहा किया गया। इन पत्रकारों को पिछले वर्ष जून में बंदी बनाया गया था। सच दुनिया के सामने न आए इसके लिए पत्रकारों को धमकाया भी जा रहा है। गत दिवस रूस में यूक्रेन पर प्रतिबंधों को लेकर एक गर्भवती रूसी महिला पत्रकार के सवाल पूछने पर वहां की संसद के डिप्टी स्पीकर ने अपने समर्थकों को कहा कि वे उस रिपोर्टर का रेप कर दें। यह दर्शाता है कि लोकतांत्रिक देशों में पत्रकारों के साथ कैसा व्यवहार हो रहा है। अगर भारत की बात करें तो स्थिति बहुत संतोजनक नहीं है। 2013 में आठ पत्रकारों की हत्या हुई। विश्व में प्रेस की आजादी के सूचकांक में भारत 140 वें स्थान पर है। पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान क्रमश: 175वें और 158वें स्थान पर हैं। उचित होगा कि दुनिया के सभी देश पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करें, अन्यथा लोकतंत्र को बचाना मुश्किल हो जाएगा।
somansh surya

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