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व्यक्ति पूजा और संघ

Posted On: 21 May, 2014 Others में

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझना आसान नहीं है। इसका मुख्य कारण यह है कि संघ वर्तमान में प्रचलित किसी राजनीतिक पार्टी या सामाजिक संस्था या संगठन के ढांचे में नहीं बैठता। कुछ लोगों को लगता हैं कि संघ में तानाशाही पद्घति से काम चलता हैं तो कुछ अन्य लोग यह दावा करते हैं कि संघ में नेतृव की पूजा होती हैं। ये दोनों भी सत्य से बिल्कुल परे हैं। व्यक्ति पूजा नहीं संघ के संस्थापक ने ऐसी एक कार्य शैली का आविष्कार किया है जो व्यक्ति पूजा से कोसों दूर है। संघ
में किसी प्रकार से व्यक्ति केन्द्रित नहीं है। हिन्दू परंपरा के अनुसार उस में ह्यगुरुह्ण का स्थान है। यह ह्यगुरुह्ण संघ का भगवा ध्वज है। यह ध्वज त्याग, पवित्रता, और शौर्य का परिचायक है, जिसके सामने संघ के स्वयंसेवक वर्ष में एक बार अपनी सामर्थ्यानुसार गुरु दक्षिणा करते हैं। किसी व्यक्ति के
स्थान का निर्धारण इस बात पर निर्भर नहीं होता कि उसने कितना समर्पण किया है। किसी व्यक्ति का गुणगान करने के लिए संघ में किसी तरह का कोई शब्द नहीं है। रोज की प्रार्थना के बाद प्रत्येक स्वयंसेवक जो जयकारा लगाता हैं वह है भारत माता की जय। अनुशासन का रहस्य संघ के भीतर का अनुशासन देख कर लोगों को अक्सर आश्चर्य होता है। जब मैं संघ के प्रवक्ता के नाते दिल्ली में था तब एक विदेशी पत्रकार ने मुझसे संघ के इस अनुशासन के रहस्य के बारे में पूछा। मैंने एक क्षण विचार किया और कहा कि शायद इसका कारण यह है कि संघ के अन्दर अनुशासन भंग करने पर कोई दंडात्मक कार्रवाई करने का प्रावधान नहीं है। मुझे पता नहीं कि मेरे इस उत्तर से वह संतुष्ट हुआ या नहीं लेकिन उसने और सवाल नहीं किए। मुझे स्वयं को भी अपने इस उत्तर पर आश्चर्य हुआ। क्या किसी ने सुना है कि संघ के 85 से अधिक साल के इतिहास में किसी के खिलाफ अनुशासन भंग करने के कारण दंडात्मक कारवाई हुई है? किसी स्वयंसेवक ने कभी अनुशासन भंग किया ही नहीं होगा, ऐसी हम कल्पना कर सकते हैं क्या? ‘अंश’ और ‘सम्पूर्ण’ संघ के विषय में एक और मूलगामी सत्य है। यह संपूर्ण समाज का संगठन है-ह्यअंशह्ण और ह्यसंपूर्णह्ण। इस दोनों शब्दों को ध्यान से समझिए। समाज के अन्दर किसी वर्गविशेष या गुट का संगठन करने हेतु संघ की स्थापना नहीं हुई थी। समाज का एक मिश्रित रूप होता हैं। समाज जीवन की अनेक गतिविधियों के माध्यम से वह अपने आप को अभिव्यक्त करता है। राजनीति ऐसा ही एक क्षेत्र है परन्तु यही एकमात्र है, ऐसा नहीं। शिक्षा, कृषि, व्यापार, उद्योग, धमंर् और ऐसे अनेक समाज जीवन के क्षेत्र हैं जिनके माध्यम से समाज अपने आप को अभिव्यक्त करता हैं। संपूर्ण समाज का संगठन यानी समाज जीवन के इन सभी क्षेत्रों का संगठन। इसलिए स्वयंसेवकों को संघ ने विभिन्न क्षेत्रों में जाने की अनुमति दी गई। प्रथम, छात्रों के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् बनी। इसमें डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी से मुलाकात की और संघ से कार्यकर्ता मांगे। उस समय पंडित दीनदयाल उपाध्याय, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री नानाजी देशमुख, श्री सुन्दर सिंह भंडारी, श्री कुशाभाऊ ठाकरे और अन्य कार्यकर्ता साथ देने निकले उनके साथ दिया जिन्होंने डॉ. मुखर्जी को भारतीय जनसंघ को बढ़ाने में सहायता की। संघ के एक और प्रमुख प्रचारक दत्तोपंत ठेंगडी को मजदूर क्षेत्र में कार्य करने की इच्छा हुई तो उन को मजदूर क्षेत्र में भेजा गया। धर्म के क्षेत्र में स्वयं श्री गुरूजी ने अगुआई कर विश्व हिन्दू परिषद् की, स्थापना की लेकिन वह उसके अध्यक्ष नहीं बने। कहीं सामाजिक सेवा के क्षेत्र में रुचि रखने वाले लोगों ने समाज उत्थान के प्रकल्प शुरू किये और बाद में संघ ने उन्हें कार्यकर्ता दिए़ वनवासी कल्याण आश्रम ऐसा ही एक प्रकल्प है।
मैं बलपूर्वक कहना चाहता हूं कि राजनीति यद्यपि समाज जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अंग हैं फिर भी वही सब कुछ नहीं है। इसलिए संघ की तुलना किसी राजनितिक पार्टी से नहीं हो सकती। संघ का हमेशा यह आग्रह रहता है कि हम एक सांस्कृतिक राष्ट्र हैं और स्वयंसेवकों को जिस किसी भी क्षेत्र में वे कार्य करते हैं, यह भूलना नहीं चाहिए और उनके सब प्रयास इस सांस्कृतिक राष्ट्रीयता को शक्तिशाली और महिमामंडित करने की दिशा में ही होने चाहिए़ इस संस्कृति का ऐतिहासिक नाम हिन्दू हैं। धमंर् और ‘रिलीजन’ हिन्दू यह इस्लाम या ईसाइयत जैसा ह्यरिलीजनह्ण नहीं है। डाक्टर राधाकृष्णन ने भी कहा है कि हिन्दू ह्यरिलीजनह्ण नहीं है, वह तो अनेक रिलीजनों का मंडल समुच्चय है। मैं इसमें यह जोड़ना चाहता हूँ कि हिन्दू धमंर् का नाम है और धमंर् की व्याख्या बहुत व्यापक है। अंग्रेजी भाषा में धमंर् का समान अर्थ विशद करने वाला योग्य प्रतिशब्द नहीं हैं। परन्तु हमें यह समझना चाहिए कि धमंर् रिलीजन नहीं हैं। रिलीजन धमंर् का एक हिस्सा हैं। हमारी भाषा के कुछ शब्द देखिये जैसे धर्मशाला-क्या धर्मशाला रिलीजियस स्कूल है? धर्मार्थ हस्पताल यानी रिलीजन का अस्पताल होता है क्या? या धर्मकांटा यह रिलीजन का वजन करने का तराजू है क्या? यह धमंर् हमारी संस्कृति का आधार है और संस्कृति यानी हमारी मूल्य व्यवस्था है। इस मूल्य व्यवस्था के लक्षण हैं श्रद्घा, विचार, और विश्वास इनकी विविधताओं का आदर करना़ अत: हिन्दुइज्म या हिंदुत्व एक विशाल छाते जैसा है जो अनेक श्राद्घों को, विश्वासों को आश्रय देता है। स्वतंत्र और स्वायत्त मुझे लगता है मैं कुछ भटक गया हूँ। अपने समाज जीवन की विविधताओं के बारे में मुझे इतना कहना है कि जिस क्षेत्र में संघ के स्वयंसेवक गए वह प्रत्येक क्षेत्र स्वतंत्र और स्वायत्त है। इन क्षेत्रों की अपनी व्यवस्था हैं, आर्थिक दृष्टि से स्वयंपूर्ण होने की इनकी अलग-अलग पद्घति हैं, और कार्य करने की उनकी अपनी शैली हैं। इन सबमें संघ कभी उलझता नहीं लेकिन मार्गदर्शन जरूर देता है। इन संगठनों के प्रतिनिधि संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में आमंत्रित किये जाते हैं जहाँ वे चर्चा में सहभागी होते हैं और उनके संगठन के क्रियाकलापों के बारे में जानकारी देते हैं। विवादित प्रश्न श्री हरतोष सिंह बल ने जो विवादित प्रश्न उपस्थित किया है भाजपा ने नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिपूजा जिस प्रकार से स्वीकारी है उसे संघ ने कैसे मान लिया? उस को मेरा उत्तर यह है कि चुनाव एक विशेष आयोजन है। मतदाताओं को आकर्षित करने हेतु किसी एक प्रतीक की आवश्यकता होती है। श्री नरेन्द्रभाई ने उसको पूरा किया है। यह प्रतीक फायदेमंद साबित हुआ है। कितने प्रतिष्ठित लोग भाजपा में शामिल हुए हैं। उनमें पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह, पत्रकार एम.जे. अकबर, और भी अनेक हैं। इसके लिए श्रेय अगर देना है तो बड़े दिल से श्री नरेन्द्र भाई को देना होगा। लेकिन यह भी हमें समझना चाहिए कि नरेन्द्र भाई को इस प्रतीकात्मक की मर्यादाओं का ध्यान है। वे संघ के प्रचारक रहे हैं और संघ की संस्कृति के मूल को समझते हैं और उससे वाकिफ भी हैं। वे प्रतिभाशाली नेता हैं और शाश्वत, समयानुकूल और आपद्घर्म क्या होता है और इनमें क्या अंतर हैं यह वे जानते है। परिशिष्ट कारवां मासिक पत्रिका के संपादक महोदय ने मुझे एक प्रश्न भेजा, वह इस प्रकार है कि वाजपेयी जी के नेतृत्व में व्यक्तिपूजा के बिना भाजपा ने चुनाव जीते थे फिर अब क्यों इस प्रकार से व्यक्ति-केन्द्रित प्रचार अभियान नरेन्द्र मोदी को केन्द्रित कर चलाया जा रहा है?
मेरा जवाब था-मैंने मूल लेख में यह स्पष्ट किया है कि चुनाव एक विशेष प्रसंग होता है- मतदाताओं को आकर्षित करने हेतु किसी प्रतीक की आवश्यकता होती है। उस समय वाजपेयी जी को भी भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया गया था। श्री आडवाणी जी के साथ भी ऐसा ही हुआ था। फिर भी वाजपेयी जी की लोकप्रियता इतनी थी कि उनके लिए किसी विशेष प्रयास की आवश्यकता ही नहीं थी। मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल में वे विदेश मंत्री थे। भाजपा के वे संस्थापक अध्यक्ष थे। लोकसभा में अनेक वषोंर् तक विपक्ष के नेता और राजनीति के केंद्र बिंदु रहे। मोदी जी का कार्यक्षेत्र अभी तक गुजरात ही रहा है। वे अभी भी वहां के मुख्यमंत्री हैं। केन्द्रीय स्तर पर भाजपा ने चुनाव की घोषणा के पहले उनको अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। आपका संकेत अगर अभी के शोरगुल की ओर है तो इसके लिए मुझे व्यक्तिश: ऐसा लगता है कि देश का मीडिया जिम्मेदार है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि किसी प्रकार की व्यक्तिपूजा का शोर मचाया जा रहा है या इस प्रकार का कोई प्रयास हो रहा है। * जनभावनाओं की पूर्ति में सफल होगी यह सरकार -भैयाजी जोशी, सरकार्यवाह, रा. स्व. संघ वर्तमान में संपन्न लोकसभा चुनाव में समस्त देशवासियों ने सारे विश्व के सम्मुख स्वस्थ लोकतंत्र का उदाहरण प्रस्तुत किया है, यह अभिनंदनीय है। हम सभी के लिए यह अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि चुनाव प्रक्रिया सामान्यत: संयम, शांति एवं जागरूकता के साथ संपन्न हुई। इसमें सहभागी सभी राजनीतिक दलों के हजारों कार्यकर्ता, निर्वाचन में सहभागी सभी दलों के सैकड़ो प्रत्याशी, प्रसार माध्यम, प्रशासन तथा सुरक्षा तंत्र, इन सबकी भूमिका संतोषजनक रही है।
निर्वाचन के कालखंड में विचारों का खंडन-मंडन, व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप हुए होंगे। हमारा विश्वास है कि चुनाव प्रक्रिया के पूर्ण होने के साथ ही सामान्य सौहार्दपूर्ण वातावरण निर्माण करने का सकारात्मक प्रयास सभी लोग करेंगे। देशविासयों ने आज तक जिस संयम का परिचय दिया है ऐसा ही सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने में आगे भी अपनी भूमिका निभाएंगे, ऐसी विनम्र प्रार्थना है। करोड़ों देशवासियों ने परिवर्तन की आकांक्षा व्यक्त की है। हमें विश्वास है कि नवनिर्वाचित सरकार जनभावना एवं अपेक्षाओं की पूर्ति करने में सफल सिद्ध होगी। हम सभी के सहयोग से वैचारिक, सामाजिक और धार्मिक भिन्नताओं से ऊपर उठकर भेदभाव और विषमतापूर्ण व्यवहार से मुक्त होकर शोषणमुक्त और समरस समाज निर्मिती की दिशा में एकात्म भाव बनाए रखने में नवनिर्वाचित सरकार सफल सिद्ध होगी ऐसी हम आशा करते हैं। लोकतंत्र में सरकार की भूमिका निश्चित ही महत्वपूर्ण होती है। परिवर्तन की प्रक्रिया की एक अपनी एक गति होती है और परिवर्तन सरकार, प्रशासन, सभी राजनीतिक दलों, जनसामान्य, सामाजिक और धार्मिक संस्थाओं के समन्वित प्रयासों से ही संभव है। नवनिर्वाचित सरकार एवं समस्त देशवासियों का हार्दिक अभिनन्दन। संघ के सरसंघचालक श्री मोहनरावभागवत ने अपने गत विजयादशमी उद्बोधन में देश की जनता से आह्वान किया था कि राष्ट्रहित के मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अधिक से अधिक संख्या में मतदान करें और उनके उस आह्वान पर काफी संख्या में मतदान हुआ। आंकड़े देखें तो पिछले चुनाव की तुलना में 10 से 12 प्रतिशत अधिक मतदान हुआ है। लोकतंत्र के लिए यह सुखद है। अच्छे दिन आने वाले हैं।

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